परंपरा का ‘खूनी खेल’, पिछले 20 सालों में 200 लोगों की मौत

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आस्था और विश्वास में रहने वाले चमत्कार को नमस्कार करते हैं. इसमें लॉजिक में जाने की ज़रूरत नहीं होती. अगर लॉजिक में गए तो दो बातें होंगी. या तो नास्तिक करार दे दिए जाएंगे या फिर आपकी जान को ही खतरा हो जाएगा. नास्तिक करार दिए गए तो फिर भी गनीमत मानिए. मगर जान को खतरा हुआ तो फिर दो बातें होंगी. या तो आप डर के खामोश हो जाएंगे. या फिर जान हथेली पर ले लेंगे. डर के खामोश हो गए तो ठीक. मगर जान हथेली पर लेने की नौबत आई तो फिर फायदा क्या. जान तो वो भी परंपरा के नाम पर हथेली पे ले रहे हैं, जिन्हें आप गलत कहने की कोशिश कर रहे हैं.

तमिलों के अहम है जल्लीकट्टू

जल्लीकट्टू दो लफ्ज़ों से मिलकर बना ये खेल तमिल लोगों के लिए बहुत मायने रखता है. जली यानी सिक्का और कट्टू यानी बांधना. रिवाज के मुताबिक इंसानों और बैलों के बीच होने वाले इस खेल में पहले इन नुकीले सींगों पर सिक्कों की एक छोटी-सी थैली बांधी जाती थी. हालांकि अब बैलों को सिर्फ काबू करने वाले को ही जीता हुआ मान लिया जाता है.

मौत का खेल

जल्लीकट्टू दरअसल बैल के साथ मौत के खेल का नाम है. एक ऐसा खेल जहां हर पल जान जाने का खतरा होता है. गुस्से से भरे हुए सैकड़ों बैल, अपनी सींगों को इंसान के पेट में घुसाने के लिए एक दरवाजे के पीछे बंद होते हैं. और दरवाजे के दूसरी तरफ लोगों की भीड़ बैल को अपने पास बुलाने के लिए तरह-तरह के जतन करती है. दरवाजा खुलता है और शुरू हो जाता है ये खेल.

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