जानिए, बैंकिंग और फाइनेंशियल सेक्टर के लिए क्यों अहम है संसद का मॉनसून सत्र

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संसद के सोमवार से शुरू हुए मॉनसून सत्र में किसानों का विरोध, गौ-रक्षा के नाम पर हो रही हत्याएं, कश्मीर में बढ़ती अशांति और सिक्किम को लेकर चीन के साथ गहराता विवाद जैसे मुद्दे छाए रह सकते हैं. हालांकि, यह सत्र बिजनेस और फाइनेंशियल मामलों के लिए काफी उपयोगी हो सकता है.

मॉनसून सत्र में रखे जाएंगे ये बिल
मॉनसून सत्र में इकनॉमिक एंड फाइनेंशियल सेक्टर के जिन बिलों को रखा जाना है, उनमें बैंकिंग रेगुलेशन (अमेंडमेंट) बिल 2017 भी है, जो कि मई में लाए गए उस ऑर्डिनेंस (अध्यादेश) की जगह लेगा, जिसने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को लोन डिफॉल्ट के मामले में बैंकों को इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस शुरू करने का निर्देश देने के लिए अधिकृत किया. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (सब्सिडियरी बैंक) एक्ट, 1959 को निष्प्रभावी बनाने वाला बिल भी संसद में मॉनसून सत्र के दौरान रखा जाएगा. SBI के पांच एसोसिएट बैंकों और भारतीय महिला बैंक के विलय के लिए यह बिल जरूरी था.

नाबार्ड की अधिकृत पूंजी बढ़ाने का बिल

फाइनेंशियल रेजोल्यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल 2017 को भी सदन में रखा जाना है, जो कि बैंकों, इंश्योरेंस कंपनियों और दूसरी फाइनेंशियल इकाइयों में बैंकरप्शी (दिवालिएपन) से निपटने के लिए एक रेजोल्यूशन कॉरपोरेशन बनाएगा. यह सरकार की प्रायरिटी लिस्ट में है. फाइनेंशियल रेजोल्यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल को केंद्रीय कैबिनेट ने 14 जून को मंजूरी दी थी.

इसके अलावा, नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डिवेलपमेंट (अमेंडमेंट) बिल 2017 भी सरकार के एजेंडे में है. फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली ने बजट सत्र के दौरान लोकसभा में इस बिल को पेश किया था. इस बिल का मकसद नाबार्ड की अधिकृत पूंजी को 5,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 30,000 करोड़ रुपये करना है. इसके अलावा, नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NIA) में भी संशोधन सरकार के एजेंडे में है.


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